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Tuesday, February 10, 2009

Cg Citizen Journalism

चौबीस घंटे  खबरिया चैनलों के होने और आए दिन थोक के भावों में अखबारों के संस्करण निकलने के वाबजूद खबरों का एक बड़ा कोना इन सबसे छूट जाता है। स्थानीय घटनाओं को लेकर उनके अपने विजुअल्स होते होगे। लेकिन इंटरनेट के भीतर आनलाइन माध्यम या आफलाइन से जुड़े एक नए वर्ग का उदय तेजी से हो रहा है जो पहले के वर्ग से बिल्कुल अलग है। ये वर्ग इंटरनेट - ब्लॉग के जरिए पत्रकारिता का काम कर रहा है। मीडिया का एक नया रुप है,विभिन्न मसलों पर नए तरीके से बात करते हैं,अपने तर्क रखते हैं ओर अपना नजरिया रखते है और उनके अपने छेत्र की अपनी समस्याये और अपने मुद्दे होते है आप सभी के पास भी ख़ुद से जुटायी ऑथेंटिक सामग्रियों का का भंडार होता है। ये सारी सामग्री संभवतः कि किसी रिपोर्टर द्वारा जुटायी सामग्री से ज्यादा ऑथेंटिक होती है। आपकी इस अभिव्यक्ति को ही हमने Cg Citizen Journalism.
 The All Cg Citizen is Journalist"! का नाम दिया है। आप सब हर दिन अपने आस पास कुछ ना कुछ ऐसा देखते है जो आपको विभिन्न राजनैतीक नजरिये से अलग सोचने समझने पर मजबूर करता है और नये मुद्दे आपके सामने होते है ,आपकी उन्ही सोच को हम cg4bhadas.com के माध्यम से "अपनी बात सत्ता के सियासत दानो के साथ" सामने रखने का प्रयास करेगे। इस लिए छत्तीसगढ के हर वो नागरिक जो अपने आस पास घट रही कोई भी धटना या उसके तथ्यात्मक साबुत जिसे आप जनता के साथ मिल कर प्रदेश में बदलाव चाहते है तो बस हमें मेल कर दीजिये और कहते रहिये वो सब जिसमे आप बदलाव चाहते है,जिसमे आप सुधार करना चाहते है आज नही तो कल वो दिन दिन जरुर आएगा जब आपके विचरो से परिवर्तन की शुरुवात होगी।

2 comments:

Sangeetha Mugunthan February 11, 2009 at 10:13 AM  

I cant read Hindi...

अजय साहू February 11, 2009 at 8:04 PM  

छत्‍तीसगढ को विकास के रास्‍ते में आगे बढने से रोकने वाला तथ्‍य भ्रष्‍टाचार है,‍यही कारण है कि यहां के शिक्षित बेरोजगारों को उनकी योग्‍यता के अनुसार रोजगार नहीं मिल पा रहा है, विद्यालय और महाविद्यालयों में लगभग 25 वर्षों से नियमित शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई है, संविदा, तदर्थ, शिक्षाकर्मी जैसे शब्‍द कानों में पिघले सीसे की तरह चुभते हैं ,क्‍योंकि इनसे पेट की आग बुझाने लायक आय भी नहीं हो पाती, तहसील, कचहरी, चिकित्‍सालय एवं अन्‍य सरकारी दफतरों में किसी काम से जाने के बारे में सोचकर भी आम आदमी भयाक्रांत हो जाता है, सडक यातायात के सरकारी साधनों के बंद होने के बाद मनमाना किराया तो वसूला ही जाता है, साथ में बदतमीजी मुफत में परोसी जाती है, ,,,,कितनी भडास निकालें यह विषय तो हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है, लेकिन इस अंधेरे में भी आशा की किरण खत्‍म नहीं हुई है, कलम की ताकत से परिवर्तन संभव है,आपका प्रयास सराहनीय है, मिलकर इन परिस्थितियों में सुधार की कोशिश की जानी चाहिए,,,

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