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Wednesday, April 7, 2010

रोने का बहाना नहीं ,लड़ने का हौसाला चाहिए

देश - प्रदेश में जब भी कोई बड़ी वारदात के मद्देनजर जन हानि होती है तब-तब बहुत से संगठन महाबंद और मोमबत्ती जलने से परहेज नहीं करते . आज कल ये फैशन सा बनता जा रहा है
जिसे देखो गाँधी की तर्ज में गाँधी बनाने की चाह लिए इस तरह के कार्यो का आयोजन करते दिखाई पड़ते है . सवाल आखिर यह है की क्या मोमबत्ती जलने और महाबंद जैसे आयोजनों से समस्या का समाधान हो जायेगा या फिर जनहानि को रोका जासकेगा दुसरे शब्दों में हम यह कहे की क्या इस कार्यो से धटित जनहानि की पूर्ति की जा सकेगी ...? शायद नहीं . अच्छा तो यह होता इसके बजाये यह संगठन हमसे दूर हुए जवानो के परिवार में से किसी एक परिवार के लिए कुछ करते. .यह संगठन इतने ही चिंतीत है तो अपनी एक दिन की तनख्वाह या अपना एक दिन में खर्च की गई राशी इन्हें भेट कर देते तब लगता की हा ये जमीनी रूप से इन सब के लिए चिंतित है बहरहाल लड़ने का हौसाला खो चुके इन संगठनों के लिए हम यही कहेगे, इन सभी को रोने का बहाना चाहिए ...

लहूलुहान धरती को तलाश है अरूंधति के आंसू की ..



कुछ दिन पहले आप यहाँ आयी थी जंहा आज हिंसा की पराकाष्ठ देखने को मिली है गरीबो की बात करना और एक
बेहतर संसार के निर्माण में आप की लेखनी कुछ ज्यादा ही बोलती है और लेखन के आलावा कला फिल्म में भी यही कुछ होता है गरीबो की बात सारा कुछ सही है.मैडम आप रूमानियत में बहती है आसू तो तब भी निकले होगे जब आपके पहले पति ने आपको तलाक दिया होगा , नहीं निकले होगे तो कुछ और बात है इस घटना को लेकर जो की निहायत ही व्यक्तिगत किस्म का है उसे लेकर हम आप पर कोई उपमा टिपण्णी नहीं लादेगे . बस्तर को लेकर आपने जो कहा लिखा और उसके बाद जो कुछ हुआ क्या उसको लिखने का आपका मन नहीं करता, यदि नहीं करता तो हम यही कहेगे लिखने पढने वाली यह मैडम कितनी संग दिल है दिल्ली में रहकर जंतर मंतर के आसा आस-पास जो कुछ करती है ऊससे कही ज्यादा प्रभावशाली होता आज के दिन आपकी आँखों से टपका हुआ दो बूंद आंसू .... . समर शेष है वही तटस्थ होगा , इतिहास में उसका भी अपराध दर्ज होगा ....

संपादक
रविकांत
CG4भड़ास.कॉम

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