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Tuesday, March 31, 2009

किलेबंदी के बजाये कांग्रेस की सेंधमारी पर ज्यादा विश्वाश - भाजपा


विधानसभा के ठीक बाद लोकसभा चुनाव की गहमा गहमी जोर पकड़ने लगी लिहाजा हर राजनैतिक दल ने स्टार  प्रचारक से लेकर गीतों तक हर वो पतैरे अपनाने  में कही परहेज नहीं किया  जिससे जनता को लुभाया जा सके लेकिन चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने "भूली ताहि बिसार दे" का नारा देते हुए कुछ भूले भटको को राह में ला लोकसभा की अग्नि परीक्षा के लिए  खुद को तैयार  कर लिया है वहीं कांग्रेस रणनीतिकारोँ का मानना है की  शोरगुल  स्टार प्रचारको और जय हो के गीतों से लैस संगीत  के चलते जनता उनके  ख़राब राजनैतिक प्रदर्शन को भूल जायेगी.  उन्होंने चावल की महिमा  का कमाल  पिछले चुनाव में देख लिया सो अब वो  उसी  राह में चलने से भी  किसी तरह का कोई परहेज नहीं  कर रही है लेकिन दूसरी बार सिरमौर बने मुख्यमंत्री रामन सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी से  चुनाव् जीतने का गुर सीखा लिया है और फिर से एक रथ यात्रा  के लिए तैयार है 
                           छत्तीसगढ की बात  करे तो छत्तीसगढ में  दो सीट ही सबसे ज्यादा चर्चित है बिलासपुर और रायपुर  , बिलासपुर में दिलीप सिह जूदेव का सीधा मुकाबला श्रीमती रेणु जोगी से है गौरतलब है कि हिन्दू वादी नेता जूदेव का यह जुमला पिछले चुनाव में बहुत लोकप्रिय हुआ था 'नोट खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं पर अजीत जोगी कांग्रेसी  किले  के  खास सीपहसलार श्रीमती जोगी को बिलासपुर  प्रत्याशी  बनाये जाने के बाद बहुत ही आक्रमक मुद्रा में है .इस तरह श्री जोगी को छोड़ बाकियों की भूमिका केवल संतरी तक ही सीमित है 
रायपुर की बात करे तो रायपुर में रमेश बैस भाजपाई अंगद का रूप ले चुके है  शांत स्वभाव के लिए मशहूर श्री  बैस जिन्होंने ने किसी का भला नहीं किया तो बुरा भी नही , वही काग्रेसी प्रत्याशी भूपेश बघेल जो अपने ही विधानसभा  क्षेत्र  से बुरी तरह परास्त  हो पुनः चुनावी मैदान में है जिनके पास  आपना हारने के लिए कुछ नहीं पर जीत गए तो वाह वाही ही 
                                बहरहाल   प्रत्याशीयों के कारनामे   और राजनैतिक  दल  के हर दिन उभरते नए गठजोड़  उनकी  सत्तासुंदरी  भोग आतुरता को   उजागर कर रहा है पर् छत्तीगढ में  भाजपा के  रणनीतिकार अपनी किलेबंदी करने के बजाये कांग्रेस की सेंधमारी पर ज्यादा विश्वाश कर रहे है                                                                                                                                  


Sunday, March 29, 2009

"नाट फार वोट"



५० साल लग गए ये सुविधा पाने में "नाट फार वोट" पर अभी भी ये अधुरा है जब नाट फार वोट का अधिकार जनता को दिया ही जा रहा है तो इसे बलेट में शामिल करना चाहिए जैसे चुनाविं प्रत्याशियों के नाम होते है और चुनाव चिन्ह की ही तरह सबसे ऊपर "नाट फार वोट" एक चीन्ह के साथ अन्कित होना चाहिए ऐसा मेरा सुझाव है. सबसे पहले या ऊपर की पैरवी मै इस लिए कर रहा हु क्यों कि हिंदुस्तान में अभी साक्षरता १००% नहीं हुई है सो इसे बैलेट में ही शामिल करते हुए प्रथम स्थान पर ही रखना चाहिए ,यह व्यवस्था रजिस्टर के विकल्प से ज्यादा प्रभावी होगा .
इसकी आवश्यकता इसलिए भी ज्यादा है क्यों कि अब चुनाव में नेता कम व्यापारी ज्यादा है हा मै इन्हें व्यापारी ही कहुगा क्यों की टिकिट मिलने से से लेकर चुनाव ख़त्म होने तक वर्तमान खर्च का आकलन करे तो कम से कम ५ करोड़ तो होता ही होगा पर हे आकडे अनाधिक्रत है लेकिन सच भी . बावजूद इसके खुली आखो मे धुल डाल कर व्यापारी ही चुनावी मैदान में दिखाई देते है और बस ५ करोड़ लगाइए और ५० या ऊससे भी ज्यादा कमा लीजिये ये उनकी प्रतिभा पर निभर करता है जनता अब इन कमाऊ व्यापारी प्रत्याशी से निजात पाना चाहती है इस लिए भी "नाट फार वोट" का फार्मूला कारगर साबित होगा . पर इसमें एक पहलु और छुट रहा है मै सभी से पूछना चाहता हू कि चुनाव आयोग में तो "नाट फार वोट" का अधिकार जनता को दे दिया पर अगर देश में चुनाव के दौरान किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी ने अगर आपके इस "नाट फार वोट" प्रयोग करते हुए रजिस्टर में हस्ताक्षर कर वोट देने से मना कर दिया तो आप क्या करगे?
बहरहाल चुनाव में वोट करने ,अपने मतों का सही प्रयोग करने और ऐसे बहुत से प्रभावशाली विज्ञापन आपको वोट करने के लिए प्रेरित करते दिखाई देगे पर "नाट फार वोट" के ऐसे प्रभावशाली विज्ञापन और प्रचार प्रसार क्यों नहीं ? लगता है उन्हें डर है कि कही "नाट फार वोट" के चाहने वालो की संख्या ज्यादा हो गई तो फिर ये इनके गले की फांस ना बन जाये

Wednesday, March 25, 2009

आपका मत

छत्तीसगढ छोटा राज्य पर चुनावी हलचले बड़ी बड़ी जिसका परिणाम हम सभी ने हाल ही में समपन्न हुए विधानसभा चुनाव में देख लिया अप्रत्याषित चुनाव नतीजो के सामने भाजपा, काग्रेस के दिग्गजों नेता हार के गर्भ में समां गए फिर एक बार उन्ही दिग्गजों की इज्जत दांव पर है राष्ट्रीय राजनीति की तरह न तो यहाँ कोई तीसरा मोर्चा और न कोई चौथा बावजूद उसके परिणाम में भारी उतर चढाव देखने मिल रहे है आने वाली १६ तारीख फिर एक नया इतिहास रचने की तैयारी में है लेकिन मतदाता का रुखा कोई नहीं समझ पा रहा है कोई भी अभी ये बताने में समर्थ नहीं की ऊट किस करवट बैठेगा. नामांकन प्रकिया के प्रारंभ होते ही सभी ने कमर कस, ली किसी ने अपनी डपली बजाई तो किसी का अपना राग . इन सब के बावजूद मतदाता खामोशी से आंकल में जुटा है युपी बिहार की तरह छत्तीसगढ की राजनीति, राष्ट्रीय राजनीति में न तो सरकार परिवर्तन का मादद रखती है और ना ही सरकार गिराने की हैसियत पर कहते है ना की बुरे वक्त में गधे को भी बाप बना पड़ता है और एक एक की कीमत बहुत होती है ये उन्ही में से एक है तो बेचारे क्या करे लगे राष्ट्रीय राजनीति के आदेशो का पालन करने में लेकिन जनता को इससे क्या उन्हें तो अपनी ही समस्या से मतलब है जो साथ देगा जो काम करेगा वही उनके काम का पर ये भी अब बेमानी सा लगने लगा है क्यों की एक सांप है तो दूसरा अजगर अब जनता बेचारी क्या करे जो कम नुकसान पहुचाये उसे ही चुन लो क्यों की कोई तीसरा विकल्प तो है ही नहीं .



क्रमांक लोक सभा क्षेत्र प्रकार

1 सरगुजा (अ.ज.जा.)
2 रायग़ढ़ (अ.ज.जा.)
3 जान्जगीर चांपा (अ.जा.)
4 कोरबा (सामान्य)
5 बिलासपुर (सामान्य.)
6 राजनांदगांव (सामान्य)
7 दुर्ग (सामान्य)
8 रायपुर (सामान्य)
9 महासमुंद (सामान्य)
10 बस्तर (अ.ज.जा.)
11 कांकेर (अ.ज.जा.)

Thursday, March 19, 2009

मुस्लिम मतदाता क्या सोचते है?


लोकसभा के चुनाव के आते ही मुस्लिम वोट्स की चर्चा होना आम बात है जैसा कि हम इससे पहले की पोस्ट में पढ़ चुके हैं कि मुस्लिम मतदाता राजनितिक दलों के लिए भेंड सामान हैं, वह सौ प्रतिशत सही है| कुछ सवाल और भी है जो सबके ज़ेहन में ज़रूर आते होंगे जैसे- "भारतीय मुस्लिम क्या सोचते है? कौन कौन से मुद्दे हैं जिनपर मुस्लिम मतदाता राजनितिक पार्टीज़ को वोट देंगे? क्या उनके मुद्दे वही होंगे जो बाकी दूसरे भारतीयों के होंगे या फिर उनके कुछ मख़सूस मुद्दे भी है? आदि"  

भारत में पिछले एक साल में राजनैतिक, सुरक्षा और सामाजिक स्थिति बहुत ज्यादा बदल गयी है, जिसके आधार पर कुछ कहना मुश्किल है, पिछले अनुमान पर कायम रहना भ्रम सा होगा | भारत में इस बीते साल में जो कुछ हुआ, उसकी वजह से हिन्दू और मुस्लिम के बीच टेंशन भी है | जो कुछ थोडी बहुत बची है वह वरुण गाँधी और अन्य साम्प्रदायिक नेता पूरी करे दे रहे है | 

सबसे ताज़ी बानगी तो नवम्बर 2008 में मुंबई में हुए हमले से बनती है जो कि पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैबा द्वारा प्रायोजित था | यह तो हमारा भाग्य ही था या हमारे देशवासियों की जागरूकता भरी सूझ बूझ कि किसी हिन्दू-मुस्लिम दंगे की कोई खबर ना ही मुंबई से या देश के किसी अन्य स्थान से आयी| वैसे मुंबई में जो हुआ उसका सीधा मक़सद था दोनों को आपस में लड़वाना | 

लेकिन सब कुछ ठीक रहा यह भी नहीं कहा जा सकता | जामिया नगर में मुस्लिम युवाओं का उत्पीड़न और पुलिस द्वारा मुठभेंड जो कि शक के दायरे में आ गयी थी और फ़र्जी थी | राजनितिक दबाव के चलते बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को मार डाला गया | इसके अलावा उत्तर भारत में शांति से रह रहे आजमगढ़ के निवासियों को प्रताडित करने से एक गुस्से और शिकायत की एक लहर मुस्लिम समाज में आ गयी थी | यह भी मुस्लिम समाज के बहुत शोक्ड सदमा है कि गुजरात के 2002 के पीडितों की समस्या जस की तस् है |  

भारत के लगभग सभी शहरों में अभी भी सुरक्षा की दृष्टि से उठाये गए सवालों की वजह से मुस्लिम की हालत भी ध्यान आकर्षित करती है | ज्यादातर शहरों में मुस्लिम को यह विश्वाश नहीं है, किसी भी तरह से विश्वाश नहीं है कि पुलिस उनसे सभ्य सुलूक करेगी |

मैं आपको एक सच्ची घटना बताता हूँ- मेरे एक दोस्त ने जो कि मुस्लिम था, पासपोर्ट कार्यालय से अपने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, उसका पासपोर्ट बन भी गया और डाकिया उसे डिलीवर करने उसके घर गया| पासपोर्ट देते समय उसने मेरे दोस्त से कहा- भैया ! बहरवा जाईके बम वम मत फोड़ दीहs , नाहीं तs हमर नौकरी चल जाई !" अब आप ही बताईये समाज में जो लहर है वह क्या सही है | 

दूसरा मुद्दा जो मुसलमानों के लिए अहम् है वह है कि सरकार या किसी भी राजनैतिक पार्टी का सच्चर कमिटी की सिफारिशों को लागू करने में नाकाम रहना | सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में भारत के मुसलमानों के हालत और उसके समाधान का पूरा इंतेज़ाम है | आज से दो साल पहले यह रिपोर्ट आयी थी और उसे आधे अधूरे मन से और निचले स्तर पर HR मंत्रालय पर काम हुआ लेकिन उसके बाद कोई भी एक्शन अभी तक नहीं लिया गया | यहाँ तक की सरकार इसे पार्लियामेंट में बहस के लिए भी नहीं ले गयी ना ही इसमें कुछ काम किया | 

ऊपर दिए गए मुद्दे क्या कम थे जो कुछ राजनैतिक पार्टियाँ भारत-अमेरिकी परमाणु करार को भी मुस्लिम मुद्दे से जोड़ने जैसा घृणित कार्य कर बैठीं | बेहद दुखद था कि उन्होंने इसे मुस्लिम विरोधी करार दिया था| इसी तरह के बेवजह के मुद्दों से कुछ कथित सेकुलर राजनैतिक पार्टियों अपने स्वार्थ और फायदे के लिए लगातार मुस्लिम वोट बटोरती आ रही हैं | 
 
ज्यादातर चुनाव में पार्टियाँ यह कोशिश करती है कि वह बड़े से बड़े पैमाने पर मुस्लिम्स' वोट्स बटोर लें और उसके लिए वह तरह तरह के हथकंडे अपनाती हैं और मुसलमानों की भावनाओं को टटोल कर अपने चुनावी वादे करती है जैसे- उर्दू को दूसरी भाषा बनाना, जुमे की नमाज़ को अटैंड करने के लिए स्कूल में आधे दिन की छुट्टी का ऐलान, मुसलमानों के पीर और औलियाओं की कब्र (मज़ार) पर जाना, कुछ मुस्लमान लीडर्स का पार्टियों द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रसंशा करना आदि!  

मुसलमान आज देख रहा है, राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों का ट्रैक रिकॉर्ड का अध्ययन कर रहा है कि उन्होंने ने मुस्लिम समुदाय के लिए क्या किया? उनके भले के लिए क्या किया और बुरे में क्या किया? उम्मीदवारों को इसी आधार पर तौला जायेगा, इस विधान सभा चुनाव में!!! आज यह मांग बहुत तेजी से उठ रही है कि वह पार्टी जो ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा मुस्लिम को दे वही वोट की हक़दार होगी|  

मुसलमान यह चाहते है कि उनसे पुलिस द्वारा अनुचित तरीके से मुसलमान होने की वजह से प्रताडित ना किया जाये या बेवजह उनके युवाओं को पुलिस उठा कर ना ले जाये और बाद में उस पर फर्जी आरोप लगा कर जेल भेज दे या आतंकी का ठप्पा लगा दे | उसे गुजरात जैसे हादसों का दुबारा सामना न करना पड़े | वह नज़र रख रहें हैं कि कौन सच्चर कमिटी की सिफारिशों को अमल में लायेगा, कौन मुसलमानों की बदहाली हो ख़तम करेगा, कौन मुसलमानों को सम्मान से जीने के लिए क़दम उठाएगा, कौन उसे दोयम के बजाये बराबर का समझेगा | वह चाहता है कि भारतीय समाज में उसे भी इज्ज़त से जीने के लिए ज़मीन, आसमान और आज़ादी चाहिए!  


देश के ज़्यादातर प्रदेशों में अन्य प्रदेशों के समान ही आधार हैं जिन से यह तय होगा कि वह किसे वोट देंगी | लेकिन अन्य मुद्दों पर मुसलमानों के वोट्स उधर ही जायेंगे जिधर दुसरे भारतीय के जैसे - मुस्लिम दलित मुद्दा, यह मुद्दा हिन्दू दलित और ईसाई दलित के समान ही है | मुस्लिम OBC मुद्दा- यह मुद्दा हिन्दू OBC और ईसाई OBC के समान ही है| निम्न आय वर्ग में गरीब मुस्लिम का वोट भी वहीँ जायेगा जहाँ गरीब हिन्दू या गरीब ईसाई या दुसरे गरीबों का जायेगा | गरीब तो यह देखेंगे (चाहे वो कोई हों) कि कौन उनके infrastructure को संवारेगा और उनके लोकेलिटी को ऊपर उठने मौक़ा देगा| कोंग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रिय स्तर की पार्टियों में मुस्लिम की दिलचस्पी का ग्राफ कम होता जा रहा है और उनका वोट स्थानीय पार्टियों हथियाती जा रहीं है जिनमे प्रमुख हैं- समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रिय जनता दल, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, DMK, AIDMK आदि|
"भारत का मुसलमान उन्हें पार्टियों द्वारा हांथों हाँथ लिए जाने और लुभावने वादों आदि से अब सतर्क हो चूका है | इसके बजाये वह देख रहा है उसके साथ साफ़-सुथरा और समानता का व्यवहार ! किसी और चीज़ से ज़्यादा मुस्लिम्स उसे वोट देने के लिए अधिक झुकेंगे जो भारत में secular democratic structure को genuinely promote करेगा, ठीक उसी तरह से जैसे मुग़ल काल के बादशाहों के समय में था जिन्होंने एक हज़ार साल भारत देश पर एकछत्र शक्तिशाली शासन करने के बाद भी हिन्दू मुस्लिम सौहार्द बरक़रार रखा !"

सलीम खान 
संरक्षक 
स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़  
लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

Monday, March 16, 2009

वरुण गाँधी ने उगला मुसलामानों के खिलाफ ज़हर !


उत्तर प्रदेश के पीलीभीत संसदीय क्षेत्र से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे वरुण गांधी ने बरखेडा में चुनावी सभा के दौरान मुसलमानों के खिलाफ जमकर ज़हर उगला। उन्होंने देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बख्शा। उनके इस आक्रामक तेवर से बीजेपी भी सकते में है। चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भी जारी किया। वरुण ने हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र पीलीभीत में एक रैली में कहा था,
'यह हाथ नहीं है। यह कमल का हाथ है। यह मुसलमानों का सर काट देगा, जय श्रीराम।'

एक अन्य सभा में उन्होंने कहा,
'अगर कोई हिंदुओं की तरफ उंगली उठाएगा या समझेगा कि हिंदू कमजोर हैं और उनका कोई नेता नहीं हैं, अगर कोई सोचता है कि ये नेता वोटों के लिए हमारे जूते चाटेंगे तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूं कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा।'
वरुण ने कहा,
'जो हाथ हिंदुओं पर उठेगा, मैं उस हाथ को काट दूंगा।'
वरुण गांधी ने देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा, गांधीजी कहा करते थे कि कोई इस गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके सामने दूसरा गाल कर दो ताकि वह इस गाल पर भी थप्पड़ मार सके। यह क्या है! अगर आपको कोई (मुसलमान) एक थप्पड़ मारे तो आप उसका हाथ काट डालिए कि आगे से वह आपको थप्पड़ नहीं मार सके।  

वरुण ने अपने विरोधियों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा,
'हमारे पास जो उम्मीदवारों की जो लिस्ट है, उस पर सभी दलों के प्रत्याशियों के फोटो लगे हैं। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की तस्वीर देखकर मेरी मौसी की बेटी ने कहा कि भैया मुझे नहीं पता था कि आपके खिलाफ ओसाम बिन लादेन चुनाव लड़ रहा है।'
मैं यहाँ पर बताता चलूँ कि सपा से रियाज़ अहमद चुनाव लड़ रहें हैं| इस वरुण ने कहा,  

'भले ही अमेरिका ओसामा को नहीं खोज पाया, पर मैं इस ओसामा को मजा चखा कर छोड़ूंगा।'  

वरुण का यहाँ तक कहना है कि रात में अगर वह किसी मुसलमान की शक्ल देख लें तो बेहोश हो जायेंगे | बड़े ही डरावने लगते हैं ये मुसलमान |  

बीजेपी एमपी मेनका गांधी के बेटे वरुण के यह बयान बीजेपी को भी रास नहीं आए। बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने इस बहाने कांग्रेस पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वरुण के भाषण में उनके परिवार का कांग्रेसी अतीत झलकता है। इसमें बीजेपी की परंपरा नहीं दिखती। इससे पहले, सोनिया ने कहा था कि वरुण ऐसी पार्टी से जुडे़ हैं, जिसकी विचारधारा और संस्कृति अल्पसंख्यक विरोधी है।  

मैं आपको फिर बताता चलूँ कि वरुण ने हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र पीलीभीत में एक रैली में कहा था, 'यह हाथ नहीं है। यह कमल है। यह मुसलमान का सर काट देगा, जय श्रीराम।' एक अन्य सभा में उन्होंने कहा, 'अगर कोई हिंदुओं की तरफ उंगली उठाएगा या समझेगा कि हिंदू कमजोर हैं और उनका कोई नेता नहीं हैं, अगर कोई सोचता है कि ये नेता वोटों के लिए हमारे जूते चाटेंगे तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूं कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा।'

अब आप ही बताईये कि क्या ऐसा होगा हमारा युवा भारत और क्या ऐसे होंगे हमारे भारत के युवा नेता??????

स्रोत: नवभारत टाईम्स

Saturday, March 14, 2009

मै चाँद बनना चाहता हू



मै चाँद बनना चाहता हू , सुनकर आश्चर्य हुआ आपको , नही होना चाहिए अगर आप भी शादी शुदा है ऊपर से हिन्दू और आपका दिल कही किसी पर आजाये ,नहीं गलती हो गई , आपको प्यार करने का मन करने लगे ,कोई आपको अच्छा लगता है तब तो बहुत मुश्किल हो गई पर घबराइये नही अब ये सब संभव है रास्ते आपके सामने है बिलकुल बस आवश्यकता है इस प्यार को पूरा करने के लिए लड़की की बस फिर आप भी पहली पत्नी के होते हुए चाँद मोहम्म्द याफिर कुछ और नाम के साथ जब तक जी करे अपने प्यार को परवान चढा सकते है कोई मुझसे ये करने कहता तो एक क्यों मुस्लिम में तो कम से कम चार की इजाजत है तो मै ३ और को इसमें शामिल कर ही सकता था बाद में भले पहली को छोड़ कर सबको तलाक़ दे देता . तो बस आप सोचिये मत आपका मन अल्पकालीन समय के लिए इश्क मोहबत करना चाहता है तो आप ऐसा कर सकते है ये मै नहीं चाँद , चाँद मोहम्द और फिजा ,उनके न्यूज़ चैनेलो में चर्चित खबरों को देख कर तो ऐसा ही लगता है. मैने ये वाकया टीवी में आने वाले सीरियल भंवर में देखा था पर ये इस धटना के पहले कि बात है टीवी सीरियल भंवर १९८४ -८५ में बना होगा सच्ची घट्नवों पर आधारित इस सीरियल में ऐसे ही एक सच्ची घटना ऊललेख किया गया था ठीक वैस ही उसमे भी चाँद की तरह पहले वो मुस्लिम और बाद में फिर हिन्दू बन जाता है कहते ही कि हर चीज के दो पहलु होते है अगर फायद भी है तो नुकसान भी अब हमें तय करना है की हम किस रास्ते को और क्यो चुने इस पुरे प्रकरण में एक और बात उभर के आ रही है कि क्या ये सब इतना आसन है और अगर है तो इसमें परिवर्तन या रोक कि आवश्यकता है अगर यु ही घर्म परिवर्तन से एक के आलावा और भी पत्नियो के प्यार को परवान चढाया जा सकता तो भारत में तो प्यार करने वालो कि कमी नहीं है ऐसे में वे सभी अपने प्यार को परवान च्ढाना चाहेगे जो सबल है क्यों की तलक के बाद उसे मेहर की रकम और भर पोषण जो देना होगा हा ये बात और है की आप जिसेप्यार करना चाह रहे है वो उस लायक है की नहीं यह देखना होगा . घटना उपरांत मुझे तो ऐसा ही लगा रहा है की बस आप तो देखते जाइये की इंडिया में कितने चाँद मोहन जन्म लेते है या फिर चाँद का ही फिर से मन किसी पे आ जाये तो मुस्लिम बनाने की मनाही तो है नहीं फिर से ४ माह के लिए धर्म परिवर्तन कर लेगे

बढ़िया है जब आप वादा ही नहीं करेगे तो काम करे या न करे कोई नहीं बोल सकता आपको..................


बढ़िया है जब आप वादा ही नहीं करेगे तो काम करे या न करे कोई नहीं बोल सकता आपको..................

हाँ....मैं हिन्दू हूँ !!!


'हिंदू' शब्द की परिभाषा

भारत वर्ष में रह कर अगर हम कहें की हिंदू शब्द की परिभाषा क्या हो सकती है? हिंदू शब्द किस प्रकार से प्रयोग किया जाता है? आख़िर क्या है हिंदू? तो यह एक अजीब सा सवाल होगा लेकिन यह एक सवाल है कि जिस हिन्दू शब्द का इस्तेमाल हम वर्तमान में जिस अर्थ के लिए किया जा रहा है क्या वह सही है ?

मैंने हाल ही में पीस टीवी पर डॉ ज़ाकिर नाइक का एक स्पीच देखा, उन्होंने किस तरह से हिंदू शब्द की व्याख्या की मुझे कुछ कुछ समझ में आ गया मगर पुरी संतुष्टि के लिए मैंने अंतरजाल पर कई वेबसाइट पर इस शब्द को खोजा तो पाया हाँ डॉ ज़ाकिर नाइक वाकई सही कह रहे हैं. हिंदू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई, कब हुई और किसके द्वारा हुई? इन सवालों के जवाब में ही हिंदू शब्द की परिभाषा निहित है|  

यह बहुत ही मजेदार बात होगी अगर आप ये जानेंगे कि हिंदू शब्द न ही द्रविडियन न ही संस्कृत भाषा का शब्द है. इस तरह से यह हिन्दी भाषा का शब्द तो बिल्कुल भी नही हुआ. मैं आप को बता दूँ यह शब्द हमारे भारतवर्ष में 17वीं शताब्दी तक इस्तेमाल में नही था. अगर हम वास्तविक रूप से हिंदू शब्द की परिभाषा करें तो कह सकते है कि भारतीय (उपमहाद्वीप) में रहने वाले सभी हिंदू है चाहे वो किसी धर्म के हों. हिंदू शब्द धर्म निरपेक्ष शब्द है यह किसी धर्म से सम्बंधित नही है बल्कि यह एक भौगोलिक शब्द है. हिंदू शब्द संस्कृत भाषा के शब्द सिन्धु का ग़लत उच्चारण का नतीजा है जो कई हज़ार साल पहले पर्सियन वालों ने इस्तेमाल किया था. उनके उच्चारण में 'स' अक्षर का उच्चारण 'ह' होता था|  

हाँ....मैं, सलीम खान हिन्दू हूँ !!!

हिंदू शब्द अपने आप में एक भौगोलिक पहचान लिए हुए है, यह सिन्धु नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया था या शायेद इन्दुस नदी से घिरे स्थल पर रहने वालों के लिए इस्तेमाल किया गया था। बहुत से इतिहासविद्दों का मानना है कि 'हिंदू' शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम अरब्स द्वारा प्रयोग किया गया था मगर कुछ इतिहासविद्दों का यह भी मानना है कि यह पारसी थे जिन्होंने हिमालय के उत्तर पश्चिम रस्ते से भारत में आकर वहां के बाशिंदों के लिए इस्तेमाल किया था।  

धर्म और ग्रन्थ के शब्दकोष के वोल्यूम # 6,सन्दर्भ # 699 के अनुसार हिंदू शब्द का प्रादुर्भाव/प्रयोग भारतीय साहित्य या ग्रन्थों में मुसलमानों के भारत आने के बाद हुआ था।  

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में पेज नम्बर 74 और 75 पर लिखा है कि the word Hindu can be earliest traced to a source a tantrik in 8th century and it was used initially to describe the people, it was never used to describe religion...  पंडित जवाहरलाल नेहरू के मुताबिक हिंदू शब्द तो बहुत बाद में प्रयोग में लाया गया। हिन्दुज्म शब्द कि उत्पत्ति हिंदू शब्द से हुई और यह शब्द सर्वप्रथम 19वीं सदी में अंग्रेज़ी साहित्कारों द्वारा यहाँ के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु प्रयोग में लाया गया। 

नई शब्दकोष ब्रिटानिका के अनुसार, जिसके वोल्यूम# 20 सन्दर्भ # 581 में लिखा है कि भारत के बाशिंदों के धार्मिक विश्वास हेतु (ईसाई, जो धर्म परिवर्तन करके बने को छोड़ कर) हिन्दुज्म शब्द सर्वप्रथम अंग्रेज़ी साहित्यकारों द्वारा सन् 1830 में इस्ल्तेमल किया गया था|  

इसी कारण भारत के कई विद्वानों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि हिन्दुज्म शब्द के इस्तेमाल को धर्म के लिए प्रयोग करने के बजाये इसे सनातन या वैदिक धर्म कहना चाहिए. स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्ति का कहना है कि "यह वेदंटिस्ट धर्म" होना चाहिए|  

इस प्रकार भारतवर्ष में रहने वाले सभी बाशिंदे हिन्दू हैं, भौगोलिक रूप से! चाहे वो मैं हूँ या संजय सेन सागर जी या कोई अन्य |  

आपकी आलोचनाओं का स्वागत है|  

सलीम खान
स्वच्छ सन्देश : हिन्दोस्तान की आवाज़
लखनऊ व पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

विधानसभा चुनाव में जनाधार खो चुके प्रत्याशी लोकसभा के लिए कितने उपयुक्त

आपको याद होगा महज 3 माह पूर्व सम्पन्न  हुए विधानसभा चुनाव और उनके अप्रत्याषित नतीजे  जिसमे  बड़े पैमाने पर  छत्तीसगढ में  भाजपा और कांग्रेसी द्दिगजो को हार का मुख देखना पड़ा था जिसका कारण  तो वे  अभी तक   खोज भी नहीं पाए थे कि अब वे लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी  के  दौड में शामिल हो गए  और  अब ये तो खोज  का विषय है कि जो प्रत्याशी एक विधान सभा चुनाव में अपना जनाधार खो कर हार का मुख देख चुके है   वह लोकसभा क्षेत्र में अपना जनाधार कैसे साबित करेगे क्यों कि लोकसभा क्षेत्र में कम  से कम एक से अधिक विधानसभा क्षेत्र  तो होगे ये तो तय है और वोटरों कि संख्या भी कही ज्यादा बावजूद इसके भाजपा और काग्रेस इस लोकसभा चुनाव में हार का मुख देख  चुके  हारे हुए प्रत्याशी के लिए दांव क्यों लगा रहा ही है ये बात समझ से परे है अगर ऐसा ही है तो ये बात नए प्रत्याशीयो के लिए ठीक है पर लगता है कि राजनीति में अच्छे प्रत्याशीयो का टोटा सा पड़ा गया है तो क्या  करे बेचारे.
  वही   आप इन चुनाव हारे हुए प्रत्याशियों के चुनावी आकडो को ध्यान से देखे तो पाएगे की इनको    मिलने वाला वोटो का प्रतिशत भी बहुत कम है मतलब ये अगर लोकसभा चुनाव में आयेगे तो आप अंदाजा लगा लीजिये की किस्मत के भरोसे कोई जीत जाये तो बात अलग है   पर  खुद की पहचान, काम और मुद्दों से तो ये संभव नहीं है

यहाँ  गैरतलब बात यह  भी है कि   बामुशकील    ही कोई ऐसा  प्रत्याशी  होगा जिसे सम्पूर्ण लोकसभा क्षेत्र में  जनता जानती पहचानती  हो   इनमे से बहुत से प्रत्याशी तो  ऐसे  भी  है जो  दुसरे जिले से आयातित है    जिसे अपने ही लोकसभा क्षेत्र जिससे वे चुनावी मैदान में है वहा  के  कुल क्षेत्र  बारे में भी  पता न  हो ,   ऐसा हो सकता है क्यों कि  वो  अभी एक विधानसभा  क्षेत्र   का ही   प्रतीनिध्त्व करते आये पर वहा से भी जनता ने नकार दिया  और ऊपर से परिसीमन ने तो क्षेत्र का नक्शा ही बदल  दिया है अब आप ही बताइए की ऐसे में इन हारे हुए विधानसभा प्रत्याशी को  लेकर  लोकसभा चुनाव  में दांव लगाना कितना  उपयुक्त होगा.  भाजपा के लिए बात कम हद तक लागु होती है पर कांग्रेस , कांग्रेसियो के लिए तो ८० फीसदी लागु होती  है कांग्रेस  में ऐसे  कई नाम तो आस पास के ही जिलो से है जो बुरी तरह से विधानसभा चुनाव में परास्त  हो चुके है अब वे सब फिर से अपनी हार  की पुनरावृत्ति को  कैसे रोका पाते है  यह देखना होगा  या यु कहे की  उनको लोकसभा प्रत्याशी  बना  दिए जाने पर वे इस  लोकसभा चुनाव के  फाइनल में अपनी हार की पुनरावृत्ति   रोक   कांग्रेस को नुकसान  से कैसे बचाते  है  यह भी देखना होगा  .  और दुसरे जिले के आयातित प्रत्याशी का जादू जनता पर कितना चलता है यह चुनाव के बाद दिख ही जायेगा


 

Friday, March 13, 2009

राजनीति में मोक्ष प्रधानमंत्री बनने से मिलता है

आडवानी जी की जय हो

आडवानी जी होली के इस रंग-बिरंगे पर्व पर आपको    व् आपके परिवार के समस्त सदस्यों को हार्दिक बधाई ........ लेकिन जो विज्ञापन मै इंटरनेट  में देखता हूँ  उसे देखा कर तो ऐसा  ही  लगता है   कि आप प्रधानमंत्री बनाने के लिए इतने लालायित है  कि आपने खुद ही अपना नाम प्रस्तवित किया  है  और  आप खुद ही   अपने नाम का  विज्ञापन कर रहे है तो मै आपसे ये जानना चाहता हू कि आप प्रधानमन्त्री देश के लिए बनना चाहते है   की अपने लिए ?  क्यों कि आपके रंग बी रंगे विज्ञापन देखा कर तो यही लगता है की आपकी प्रधानमन्त्री बनने की लालसा आप पर   इस कदर हावी हो चुकी है की आपने अपने अलावा भाजपा के किसी व्यक्ति या पदाधिकारी का   भी कही  कोई नमो निशान नहीं रखा   सभी को नगण्य कर दिया और खुद को खुद से ही प्रोजेक्ट करते हुए भारत के प्रधानमन्त्री का दावेदार बना दिया  इतनी महत्वकान्क्षा  भी ठीक नहीं  ,  हो सकता है  ये सही भी हो लेकिन क्या आपने कभी ऐसा देखा है की खुद ही खुद का प्रस्ताव रखता है मंच में भी हमें हार   पहनने और सम्मानित होने के लिए कोई और ही हमें प्रस्तावित करता है  और अखबारों में लगने वाले  विज्ञापनों के नीचे भी  प्रस्तावक कोई हमारा शुभ चिन्तक होता है   ना कि खुद हम ही  अब आप ही बताइए कि आपके विज्ञापन में आप अकेले ही दिखाई पड़ते है तो क्या ये मान   ले कि आपका कोई शुभ चिंतक नहीं है या कोई हितैषी नहीं  ,  जानता हू की जैसे मरने से पहले  हिन्दुओ के लिए  तीर्थ धाम की यात्रा ज़रूरी है तभी उनको मुक्ति मिलती है   , उसी तरह मुस्लिमो में मक्का या हज किये  बगैर उनका जीवन व्यर्थ है ठीक उसी तरह राजनीति में मोक्ष का रास्ता देश का प्रधानमन्त्री बनने के बाद ही मिलता है लेकिन  इसका ये   मतलब तो नहीं की आप अकेले अपने लिए प्रधानमंत्री बन रहे है आपको किसी और से कोई लेना देना नही? हो सकता है आपको मेरी बाते दुखी करे लेकिन आप ही बताइए कि क्या कोई खुद कोई प्रस्तावित करता है  आपने यह भी देखा होगा की अगर हम किसी को  विज्ञापन  के माध्यम से  बधाई या  शुभाकमाये देते है  तो भी नीचे दुसरे का नाम होता है जो हमारा शुभचिंतक होता है  तो आप ही बताइए की आपके  विज्ञापन  को देख कर क्या मेसेज जाता है  ,  निःसंदेह आपके द्वारा चलाया गया अभियान सराहनीय है. हो सकता है , आपको सफलता भी मिल जाये लेकिन उसके बाद भी आपके  विज्ञापनों को देख कर मेरा सवाल यही होगा कि क्या  आप प्रधानमन्त्री  अपने लिए बनना  चाहते  है , देश के लिए  या  कि जनता के लिए ?

मंदी से बचाव: भारत में भी इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली लागू हो ! (एक विकल्प)


अमेरिका और यूरोप में मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली चालू करने पर गंभीरता से विचार चल रहा है| गौरतलब है कि इस्लामिक बैंक बिना ब्याज़ के अपना व्यवसाय करते हैं | अभी तक यह बैंकिंग सिर्फ इस्लामिक मुल्कों में ही चलन में है | मंदी के इस दौर में जब अमेरिका और यूरोप के बड़े बड़े बैंक दिवालिया हुए चले जा रहे हैं, तब बाज़ार को मंदी से बचाने के लिए तथा निर्यातकों को राहत देने के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपनाने पर ज़ोर दिया गया जा रहा है | इस प्रणाली के तहत बैंक निर्यातकों से उनका माल खरीदतें हैं और अपने रिस्क पर उसको निर्यात करते हैं, जिससे निर्यातकों को ख़तरा कम हो जाता है | यह बैंक लघु उद्योगों को जब व्यापार करने के लिए पैसा देतें हैं तो उनसे ब्याज़ के बजाये सर्विस चार्ज के रूप में एक छोटी सी रक़म लेते हैं, यही नहीं लघु उद्योग जब डूबने लगते हैं तो उनको दिवालिया होने से बचाने का प्राविधान भी इस प्रणाली में है|  

भारत के कालीन निर्यातकों ने भी मंदी से निपटने के लिए इस्लामिक बैंकिंग प्रणाली अपनाने की मांग की है|

Thursday, March 12, 2009

शिकार बनी एक और छात्रा, जबर्दस्ती केमिकल पिलाया


अभी हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेज के छात्र की मौत को हफ्ता भी नहीं बीता कि फिर रैगिंग ने एक छात्रा को अपना शिकार बना लिया। आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के बापटला इंजीनियरिंग कॉलेज में 20 साल की एक छात्रा को उसकी सीनियर्स ने केमिकल पीने पर मजबूर कर दिया और उसे मौत के मुंह में पहुंचा दिया।


मालूम हो कि 20 साल की त्रिवेणी पढ़ाई के लिए कर्नाकट के बापटला आई थी। यहां उसने इस गवर्नमेंट ऐग्रिकल्चर इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। त्रिवेणी फर्स्ट ईयर की छात्रा है। लेकिन कॉलेज में उसकी रैगिंग शुरू हो गई।


रैगिंग के नाम पर त्रिवेणी को काफी तंग किया गया। उसके कपड़े उतरवाए गए। फिर उसे बिना कपड़ों के नाचने को कहा गया। त्रिवेणी के साथ यही नहीं हुआ बल्कि उसे जबर्दस्ती हेयर डाई सॉल्युशन पीने को कहा गया, वो केमिकल जिससे लोग बाल रंगते हैं। त्रिवेणी ने मना किया तो उसे धमकी दी गई। मजबूरन बेचारी त्रिवेणी को बालों को रंगने वाला डाई पीना पड़ा।


रात में जब उसकी तबीयत बिगड़ने लगी तो उसे अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टर के मुताबिक जब उसे लाया गया तो उसके चेहरे और गले में काफी सूजन थी। बड़ी मुश्किल से उसे बचाया जा सका।


वहीं त्रिवेणी के घरवाले भी कह रहे हैं कि उनकी बेटी लगातार रैगिंग की शिकायत करती थी और जब उन्होंने इसकी शिकायत कॉलेज प्रशासन से करने की सोची तो त्रिवेणी ने ये कहकर मना कर दिया कि सीनियर्स के खिलाफ बोलने से उसे पढ़ाई में नुकसान हो सकता है।

त्रिवेणी ने उन सीनियर छात्राओं का नाम भी बताया जिन्होंने उसे अस्पताल के बिस्तर पर पहुंचा दिया। इनके नाम हैं श्रेवंती, सौजन्या, नाजमा, वनीता और साहिथी।


गौरतलब है कि महज तीन दिन पहले गुड़गांव के रहने वाले एक नौजवान को हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेज में उसके सीनियर्स ने पीट पीटकर मार डाला। उसकी गलती बस इतनी थी कि उसने रैगिंग की शिकायत कॉलेज प्रशासन से की थी।

चरित्र या चहरे की सुरक्षा ?

Wednesday, March 11, 2009

कहां गई तिलक होली, और होली अपराध कब से ?




कहा गई तिलक होली ?
तिलक होली , के चर्चे सुन रहा था पर पहले मुझे लगा की ये स्थानीय किसी संगठन की उपज होगी  जो की अक्सर तीज  त्योहरों के आते ही  आये दिन कोई नया शगुफ़ा छोड़ देते है ,   पर बाद में मेरी नजर शहर में लगे ऐसे होर्डिग पर पडी
पहले मेरी  समझ में नही आया कि  ये क्या बला है  फिर बाद  में ध्यान से देखने पे मुझे दिखाई दिया   "जिसमे होली खेलना अपराध है लिखा था"  ये वही विज्ञापन है 

अब तो आपको विश्वाश हो गया अगर नहीं हुआ और कुछ दीखता हु




अब देख लिया आपने चलिए कल मै राज भवन , मुख्यमंत्री निवास  और शहर में खेली गई  होली के चित्र भी आपको दिखाऊगा    जंहा  दूर दूर तक कही तिलक होली का   नामो निशान नहीं है फिर ये सब क्यों ? सस्ती लोकपियता के लिए या कुछ और ?  मेरी परेशानी ये नहीं बल्कि ये है


 
अब आप ही बताइए की होली पर्व ,  खेलना कब से अपराध हो गया है ये मै नहीं ये विज्ञापन कह रहा है जो की दैनिक भास्कर ने जारी किया है और ऐसे होर्डिग से शहर पटा पड़ा है
मेरे एक मित्र  http://anilpusadkar.blogspot.com/ ने ब्लाग में इसे बड़े विस्तार से लिखा था पर उस समय भी मै नहीं समझ पाया मुझे लगा की बस यु ही कोई मुद्दा है फिर मेरी नजर इस विज्ञापन पर पड़ी ऐसा लगा मानो   सांप सूंघ गया हो,  क्या हो गया है इस देश को  हर आदमी दुसरे को बेवकूफ  क्यों बनाना चाहता  है  आखिर  क्या ऐसी वजह है की बाकि सभी को वेव्कुफ़ समझ   लिया जाता है सिर्फ इसलिए की वो मुकाम पे है या वो कुबेर पुत्र है , और सवयं भू मठाधीश है इस देश के लिए  वो जो कहेगे सही होगा देखिये इसे
इसका क्या मतलब निकलता है , यह मेरी परेशानि की वजह यह है , यह  बात मै ब्लागों  के बीच इस लिए रख रहा हु क्यों की मेरा ऐसा मानना है ही कि ब्लागरो जितना बुद्धिमान तो कोई नहीं और वे  निःस्वार्थ,  सच के लिए लड़ रहे है हा ये एक अघोषित लडाई है जो हम सभी ब्लागर बिना स्वार्थ के लड़ रहे है,  बिना फायदे के कर रहे है क्या मिलेगा हमें इस सब से  हो सकता है कि   उल्टा हमारा  नुकसान   ही  हो , पर अगर आप किसी और देश में ऐसे भ्रामक विज्ञापन तो क्या वहा जाके उनके  सडको पे कचरा फेक के दिखाओ ,  कुछ नहीं  नहीं तो एक पीक ही थूंक  के दिखावो  पता चल जायेगा आपको कि आजादी क्या   होती   है. अब मै ये सोच रहा हु कि क्यों न इनको सबक सिखाया जाये सस्ती लोकप्रियता या किसी के गुड बुक में आने के लिए क्या ऐसा करना सही है, अगर इन्हें इतनी ही चिंता है देश की तो एक IPL का  धन देश के किसी हिस्से में   विकास कार्य  में खर्च करे वो भी स्वयम से वो तो उनसे होता नहीं उल्टा भीख मागते रहते है सरकार से और सरकार भी नहीं सारा धन  NGO ,S का है  जो   वल्ड बैंक का  कर्ज है हम पर और ये सारे धनी और कुबेर पुत्र जन सेवा करने का दावा करते है  इंडिया में जितने NGO चल रहे है [ कुछ एक को छोड़कर ] वो सब   या तो फर्जी है या तो वो जिनके  पास नियंत्रण है उनकी पत्निया चला रही है और ये सारे मिल के देश के विकास की बात करते है बड़े बड़े आयोजन तो  होते है जिनमे आम जनता के जीवन स्तर को उंचा उठा ने की बात कही जाती है पर उस आयोजन में आम व्यक्ति का पता ही नहीं होता.  इसी तरह ऐसे कई मसले है   जो होते  तो आम जनता के लिए पर जनता का वहा अता पता   ही नहीं होता उसी तरह ये विज्ञापन,  जानता  हू की पानी की समस्या  देश में व्याप्त है  पर होली अपराध कब से हो गई भाई इसका जवाब तो चाहिए और मेरा तो ऐसा मानना  है की एक जनहित याचिका लगाना चाहिए इसमें जरा हम भी तो जाने की होली कैसे अपराध हो गई पता तो चले की वेलेंनटाइन  डे और खुद के द्वारा आयोजित रैनडांस  अपराध नहीं है क्यों की वो बिसनेस देता है पर होली अपराध है आप सभी के  सुझाव आमंत्रित है

Monday, March 9, 2009

चलिए फिर से होली के रंग में रंग जाये

मेरे शुभचिन्तको के लिए

मित्रवर, स्नेह


आपके आमंत्रण के लिए आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ ! नए नवेले राज्य के लिए उद्देश्यपरक , ब्लॉग की स्थापना का आपका विचार अत्यंत सराहनीय है ! ब्लॉग को रूपाकार देने में जो मेहनत आपने की है उसके लिए , साधुवाद ! किन्तु एक बात जो मुझे खटकती है , वो ये कि आपने 'नव राज्य' के लिए ब्लॉग शीर्षक 'नया' नहीं बनाया ! संभवतः ये 'शीर्षक' दूसरे लोग भी इस्तेमाल कर रहे हैं ? है ना ? वैसे ये मेरा व्यक्तिगत विचार है कि 'राज्य नया' तो शीर्षक भी नया होना चाहिये ! कृपया अन्यथा नहीं लेंगे !

मेरे कहने का आशय ये है कि ब्लॉग शीर्षक को छोड़ दूं तो आप मुझे अवधारणात्मक दृष्टि से अच्छे लग रहे हैं ! हम मिलते रहेंगे !



अनन्त सुमंगलकामनाओं सहित !



आपका अंतर्जाल स्वजन !

अली जी

जवाब

मित्रवर, स्नेह अली जी


आपका सन्देश मिला जानकर ख़ुशी हुई की कोई तो मेरे ब्लाग के बारे में भी सोचता है

१. नए राज्य से मेरे ब्लाग का कोई लेना देना नहीं

२. रही बात cg4भड़ास.com की बात कर रहे है तो ये मेरे ख्याल से नया है और नए पुराने का कोई मतलब नहीं है बल्कि मै इस आश्य को ले कर चल रहा हु की छत्तीसगढ की भड़ास
मतलब साफ है की छत्तीसगढ जैसा की आप जानते ही है नव राज्य है और हमारे आस पास बहुत कुछ ऐसा चल रहा है जिसे देख कर हम सहज ही भडासी हो जाते है
तो बस उसमे मैंने CG4 मतलब छत्तीसगढ जोड़ दिया है छत्तीसगढ की भड़ास या यु कहे छत्तीसगढीयों की भड़ास .
भड़ास जितना प्रचलित नाम है उतना ही ब्लाग में विख्यात भी  , मै भी भडासीयो में से ही हु ६ माह तक निरंतर सभी भडासियो को पढ रहा था फिर लगा की मीडिया 4 भड़ास की तरह मै छत्तीसगढ की भड़ास से मै सत्ता के सियासत दानो को तो जगा ही सकता हु और मेरा कांसेप्ट सीधा है की जनता जो देखती है जो गलत हो रहा है जो उन्हें दीखता है लगता है वह सब आकर ब्लाग में बोले इसलिए नहीं की मुझे ख्याति चाहिए बल्कि इसलिए  नहीं की मुझे ख्याति चाहिए बल्कि इसलिए की जो गलत हो रहा है चल रहा है उसमे पिसती तो जनता ही है और घन भी उन्ही का अपव्यय होता है इस लिए सभी से कहता  हु कहिये मुना भाई की तरह बोलते  रहिये आज नहीं तो कल हमारी आवाज सत्ता के सियासत दानो तक पहुचेगी हो सकता है की इससे हमारे  छत्तीसगढ  का  ही  भला हो और दुसरे तरीके से देखे तो ये जनता का ही फायदा होगा  जैसा की आपने सुना ही होगा की छत्तीसगढ सरकार ने पयर्टन बोर्ड पर 400 करोड़ खर्च किये   और कमाई मात्र  20 लाख तो ये है हमारी जनता की सेवक सरकार     ही    इसलिए मेरा ये मानना है की  The All Cg Citizen is Journalist"!  और हमने इसे    Cg Citizen Journalism  का नाम दिया है। और रही बात मीडिया 4 भड़ास की तो मैंने उससे प्राभवित होकर ही चालू किया है यह बात मैंने यशवंत जी को भी बताई थी . मेरे ख्याल से अब आपको सभी सवालों के जवाब मिल गए होगे .
आपका बहुत बहुत शुक्रिया पर क्या आप मुझे अपना परिचय बतायेगे जैसे आप    छत्तीसगढ से है की नहीं .... तो मुझे और ख़ुशी होती

रविकांत

* माफ़ करना दोस्तों होली के समय ये सब लिखना पढ़ रहा है पर क्या  करता किसी ने जानना चाह सो बता दिया विस्तार से होली के बाद ........
cg4भड़ास.com
http://cg4bhadas.com/readstory.php?id2=61&catid=17&subcatid=102

ब्लाग की होली में आप सभी का स्वागत है

होली के मेद्दे नजर ब्लागरो में जो उत्साह दिखाई दे रहा है  कही  वह किसी तूफान का आगाज तो नहीं इसी बहाने सब अपनी ब्लाग वाली भड़ास  होली     के बहाने निकालने के मुंड में तो नहीं है ?

मै कहा हु बताइए जरा ?


कांग्रेस और भाजपा को भी होली की शुभकामनाये


चलिए फिर से होली के रंग में रंग जाये


HAPPY HOLI


ब्लाग होली में शामिल होइए सभी को ठंडाई का न्योता भेज रहा हु











साथ में नीबू का आचार लाना मत भूलना

होली तुम जीयो हजारो साल सबको खुशिया दो बार बार




होली मंगलमय हो


गजब है ये रंग


मस्ती की होली


आयो खेले होली, दिल से दिल तक है ये सफ़र इस बार ... फागुन अंत तक

सारे देश की जनता और सभी छत्तीसगढ भाई मन ला होली मुबारक होए

बुरा ना मनो होली है होली की हार्दिक शुभकामनाये

पारम्परिक होली

होली की हार्दिक शुभकामनाये

Sunday, March 8, 2009

जीवन से जुड़े होली के और भी रंग है

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

                                                                                                 साभार दैनिक छत्तीसगढ

Wednesday, March 4, 2009

jaagore

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